Story Jo Aaako Aage Badne Ki Avasar Dege....
Thanks For Regards,
Aditya Singh
My Firsh Story - I
Aditya Singh के तरफ से
समस्त परिवार एवं सहकर्मियों का गर्मजोशी के साथ अभिनंदन!
हकीम लुकमान ने एक दिन अपने बेटे को पास बुला कर धूपदान की ओर इशारा किया। इशारे को समझ बेटा धूपदान में से एक मुट्ठी चंदन और फिर लुकमान ने दूसरा इशारा किया। इशारा समझ बेटा दूसरे हाथ में चूल्हे में से कोयला ले आया।
लुकमान ने फिर इशारा किया कि दोनों को फेंक दो। बेटे ने दोनो को फेंक दिया। लुकमान ने बेटे से जानना चाहा कि अब उसके हाथों में क्या है?बेटे ने बताया कि दोनों हाथ खाली हैं। लुकमान ने कहा, ऐसा नहीं है। अपने हाथों को गौर से देखो। बेटे ने अनुभव किया कि जिस हाथ में चंदन का चूरा था, वह अब भी खुशबू बिखेर रहा है और जिस हाथ में कोयला रखा था, उसमें अब भी कालिख नजर आ रही थी।
लुकमान ने कहा, बेटा, चंदन का चूरा अब भी तुम्हारे हाथ में खुशबू दे रहा है, जबकि तुम्हारे हाथ में अब चंदन नहीं है। कोयले का टुकड़ा तुमने हाथ में लिया तो तुम्हारा हाथ काला हो गया और उसे फेंक देने के बाद भी हाथ काला है।
इसी तरह दुनिया में कुछ लोग चंदन की तरह होते हैं, जिनके साथ जब तक रहो तब तक हमारा जीवन महकता रहता है और उनका साथ छूट जाने पर भी वह महक हमारे जीवन से जुड़ी रहती है। दूसरे ऐसे होते हैं जिनके साथ रहने से भी और साथ छूटने पर भी जीवन कोयले की तरह काला हो जाता है।
यदि आप दक्ष और प्रतिष्ठित लोगों से जुड़े हैं, तो आपको यह बताने में गर्व महसूस होता होगा कि मैं फलां व्यक्ति के साथ काम कर रहा हूं।सामने वाले पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ता है। दूसरी ओर कम प्रतिष्ठित लोगों के साथ काम करने पर आपकी छवि भी वैसी ही बन जाती है, भले ही आप बहुत प्रतिभाशाली हों।
संक्षेप में
कोशिश यही करें कि अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों के साथ काम करें, इससे न केवल ज्यादा से ज्यादा सीखने को मिलेगा। बल्कि आपकी अच्छी ब्रांडिंग भी हो।
शुभकामनाओं के साथ्…
दोस्तों इस कहानी से आपको क्या सिख मिली हमें जरूर बताइयेगा कमेंट में जरूर लिखियेगा या मेल कीजियेगा हमे आपकी मेल का रहेगा इंतज़ार। ।
Thanks For Regards,
Aditya Singh
My Firsh Story - II
Aditya Singh के तरफ से
समस्त परिवार एवं सहकर्मियों का गर्मजोशी के साथ अभिनंदन!
रोम ओलंपिक में लोग ८३ देशों के ५३४६ खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रुडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रुडोल्फ़ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होता देखने वे लिए ही इतने उत्सुक थे पूरी दुनिया वे लोग और खेल-प्रेमी।
डॉक्टर के मना करने के बावजूद विल्मा रुडोल्फ़ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई। अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही। उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊँचा कर लिया कि असंभव-सी बात पूरी कर दिखलाई। एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। सच यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती।
दोस्तों इस कहानी से आपको क्या सिख मिली हमें जरूर बताइयेगा कमेंट में जरूर लिखियेगा या मेल कीजियेगा हमे आपकी मेल का रहेगा इंतज़ार। ।
शुभकामनाओं के साथ्…
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